निर्झरेर स्वप्नभंग

রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর (1861–1941)

एकोत्तरशती

आजि ए प्रभाते रविर करकेमने पशिल प्राणेर ’पर,केमने पशिल गुहार आँधारे प्रभातपाखिर गान।ना जानि केन रे एतदिन परे जागिया उठिल प्राण।जागिया उठेछे प्राण,ओरे उथलि उठेछे वारि,ओरे प्राणेर वेदना प्राणेर आवेग रुधिया राखिते नारि।थर थर करि काँपिछे भूधर,शिला राशि राशि पड़िछे खसे,फुलिया फुलिया फेनिल सलिलगरजि उठिछे दारुण रोषे।

हेथाय होथाय पागलेर प्रायघुरिया घुरिया मातिया बेड़ाय—बाहिरिते चाय, देखिते ना पाय कोथाय कारार द्वार।केन रे विधाता पाषाण हेन,चारिदिके तार बाँधन केन!भाङ् रे हृदय, भाङ् रे बाँधन,साध् रे आजिके प्राणेर साधन,

लहरीर ’परे लहरी तुलियाआघातेर ’परे आघात कर्।मातिया यखन उठेछे परानकिसेर आँधार, किसेर पाषाण!उथलि यखन उठेछे वासना,जगते तखन किसेर डर!

आमि ढालिब करुणाधारा,आमि भाङिब पाषाणकारा,आमि जगत् प्लाविया बेड़ाब गाहियाआकुल पागल-पारा।केश एलाइया, फुल कुड़ाइया,रामधनु-आँका पाखा उड़ाइया,रविर किरणे हासि छड़ाइया दिब रे परान ढालि।शिखर हइते शिखरे छुटिब,भूधर हइते भूधरे लुटिब,हेसे खलखल गेये कलकल ताले ताले दिब तालि।एत कथा आछे, एत गान आछे, एत प्राण आछे मोर,एत सुख आछे, एत साध आछे—प्राण हये आछे भोर॥

की जानि की हल आजि, जागिया उठिल प्राण,दूर हते शुनि येन महासागरेर गान।

ओरे चारिदिके मोरए की कारागार घोर,भाङ् भाङ् भाङ् कारा, आघाते आघात कर्।ओरे आज की गान गेयेछे पाखि,एसेछे रविर कर॥१८८२ ‘प्रभात संगीत’