प्राण
एकोत्तरशती
मरिते चाहि ना आमि सुन्दर भुवने,मानवेर माझे आमि बाँचिबारे चाइ।एइ सूर्यकरे एइ पुष्पित काननेजीवन्त हृदय-माझे यदि स्थान पाइ!धराय प्राणेर खेला चिरतरङ्गित,विरह मिलन कत हासि-अश्रुमय—मानवेर सुखे दुःखे गाँथिया संगीतयदि गो रचिते पारि अमर-आलय!ता यदि ना पारि तबे बाँचि यत कालतोमादेरि माझखाने लभि येन ठाँइ,
तोमरा तुलिबे बले सकाल बिकालनव नव संगीतर कुसुम फुटाइ।हासिमुखे नियो फुल, तार परे हायफेले दियो फुल, यदि से फुल शुकाय॥