व्यक्त प्रेम

রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর (1861–1941)

एकोत्तरशती

केन तबे केड़े निले लाज-आवरण!हृदयेर द्वार हेने बाहिरे आनिले टेने,शेषे कि पथेर माझे करिबे वर्जन॥

आपन अन्तरे आमि छिलाम आपनि,संसारे शत काजे छिलाम सबार माझे,सकले येमन छिल आमिओ तेमनि॥

तुलिते पूजार फुल येतेम यखन—सेइ पथ छाया-करा, सेइ बेड़ा लता-भरा,सेइ सरसीर तीरे करबीर बन—

सेइ कुहरित पिक शिरीषेर डाले,प्रभाते सखीर मेला, कत हासि कत खेला,के जानित की छिल ए प्राणेर आड़ाले॥

बसन्ते उठित फुटे बने बेलफुल,केह बा परित माला, केह बा भरित डाला,करित दक्षिण वायु अञ्चल आकुल॥

बरषाय घन घटा, बिजुलि खेलाय,प्रान्तरेर प्रान्तदिशे मेघे बने येत मिशे,जुँइगुलि विकशित बिकालबेलाय॥

वर्ष आसे वर्ष याय, गृहकाज करि—सुख दुःख भाग लये प्रतिदिन याय बये,गोपन स्वपन लये काटे विभावरी॥

लुकानो प्राणेर प्रेम पबित्र से कत!आँधार हृदयतले मानिकेर मतो ज्वले,आलोते देखाय कालो कलङ्केर मतो॥

भाङिया देखिले छि छि नारीर हृदय।लाजे-भये-थरथर भालोबासा सकातरतार लुकाबार ठाँइ काड़िले, निदय॥

आजिओ तो सेइ आसे बसन्त शरत्‌।बाँका सेइ चाँपाशाखे सोना-फुल फुटे थाके,सेइ तारा तोले एसे, सेइ छाया पथ॥

सबाइ येमन छिल, आछे अविकल;सेइ तारा काँदे हासे, काज करे, भालोबासे,करे पूजा, ज्वाले दीप, तुले आने जल॥

केह उँकि मारे नाइ ताहादेर प्राणे,भाङिया देखेनि केह हृदय गोपनगेह,आपन मरम तारा आपनि ना जाने॥

आमि आज छिन्न फुल राजपथे पड़ि,पल्लवेर सुचिकन छायास्निग्ध आवरणतेयागि धूलाय हाय याइ गड़ागड़ि॥

नितान्त व्यथार व्यथी भालोबासा दियेसयतने चिरकाल रचि दिबे अन्तराल,नग्न करेछिनु प्राण सेइ आशा निये॥

मुख फिरातेछ सखा, आज की बलिया!भूल करे एसेछिले? भूले भालोबेसेछिले?भूल भेङे गेछे ताइ येतेछ चलिया?

तुमि तो फिरिया याबे बइ काल,आमार ये फिरबार पथ राख नाइ आर,धूलिसात् करेछ ये प्राणेर आड़ाल॥

ए की निदारुण भूल, निखिलनिलयेएत शत प्राण फेले भूल करे केन एलेअभागिनी रमणीर गोपन हृदये॥

भेबे देखो, आनियाछ मोरे कोन्‌खाने—शत लक्ष-आँखि-भरा कौतुक-कठिन धराचेये रबे अनावृत कलङ्केर पाने॥

भालोबासा ताओ यदि फिरे नेबे शेषेकेन लज्जा केड़े निले एकाकिनी छेड़े दिलेविशाल भवेर माझे विवसना वेशे॥२४ मई १८८८ 'मानसी'